संसद द्वारा खान और खनिज (विकास और विनियमन) संशोधन विधेयक 2026 पारित किए जाने के बाद झारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने केंद्र सरकार के खिलाफ राज्यव्यापी आंदोलन का ऐलान किया है, उनका दावा है कि इससे राज्य के वित्तीय अधिकार और सामाजिक सुरक्षा योजनाएं गंभीर रूप से प्रभावित होंगी।
- संसद ने खान और खनिज (विकास और विनियमन) संशोधन विधेयक, 2026 पारित किया।
- मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने इसे राज्य के आर्थिक अधिकारों पर कुठाराघात बताते हुए बड़े आंदोलन की चेतावनी दी।
- विधेयक से राज्यों द्वारा खनिजों पर अतिरिक्त टैक्स/सेस लगाने के अधिकार को नियंत्रित किया गया है।
- झारखंड सरकार के अनुसार इससे मंईयां सम्मान और अबुआ आवास योजनाओं के बजट पर सीधा असर पड़ेगा।
रांची: संसद के दोनों सदनों (लोकसभा और राज्यसभा) से खान और खनिज (विकास और विनियमन) संशोधन विधेयक, 2026 (MMDR Amendment Bill 2026) पारित होने के बाद केंद्र सरकार और झारखंड सरकार के बीच टकराव चरम पर पहुंच गया है। झारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन और सत्तारूढ़ झारखंड मुक्ति मोर्चा (JMM) ने इस कानून को 'काला बिल' करार देते हुए पूरे राज्य में ऐतिहासिक जन-आंदोलन छेड़ने की घोषणा की है। मुख्यमंत्री ने कड़े शब्दों में सवाल उठाते हुए कहा कि 'खनिज झारखंड का, जमीन झारखंड की—तो हमारे हक-अधिकार का फैसला दिल्ली क्यों करेगी?' देश के खनिज संसाधनों, संघीय ढांचे और राजनीतिक हलचल से जुड़ी खबरों के लिए हमारे पोर्टल से जुड़े रहें।
विधेयक के मुख्य प्रावधान और राज्यों के अधिकारों पर बंदिश
संसद द्वारा पारित नए संशोधन विधेयक के तहत मुख्य खनिजों (जैसे कोयला, लौह अयस्क, चूना पत्थर आदि) और खनिज युक्त भूमि पर राज्य सरकारों द्वारा मनमाना सेस, टैक्स या अतिरिक्त उपकर (Cess/Levy) लगाने के अधिकार को नियंत्रित किया गया है। इसके साथ ही नए सेक्शन 9D के तहत राज्य सरकारों द्वारा लगाए गए ऐसे पुराने बकाया जो अब तक वसूले नहीं गए हैं, उन्हें अमान्य घोषित करने का प्रावधान किया गया है। केंद्र सरकार का तर्क है कि देश भर में एक समान टैक्स व्यवस्था (Uniform Fiscal Framework) बनाने और उद्योगों पर अत्यधिक वित्तीय बोझ कम करने के लिए यह सुधार आवश्यक है।
कल्याणकारी योजनाओं पर संकट का दावा
मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने आरोप लगाया है कि इस कानून के जरिए केंद्र ने राज्य के आर्थिक संसाधनों पर सीधा प्रहार किया है। झारखंड सरकार ने सुप्रीम कोर्ट की 9 जजों की संविधान पीठ द्वारा 2024 में दिए गए फैसले के आधार पर 'झारखंड मिनरल-बेयरिंग लैंड सेस' लागू किया था, जिससे राज्य को लगभग ₹14,656 करोड़ के वार्षिक राजस्व की उम्मीद थी। राज्य सरकार का दावा है कि इस राजस्व का बड़ा हिस्सा 'मुख्यमंत्री मंईयां सम्मान योजना' (₹9,000 करोड़ का बजट), 'अबुआ आवास योजना', वृद्धावस्था पेंशन, शिक्षा और स्वास्थ्य जैसी जनकल्याणकारी योजनाओं को चलाने के लिए निर्धारित था, जिस पर अब गहरा संकट खड़ा हो सकता है।
पंचायत से लेकर शहर तक आंदोलन की रूपरेखा
झामुमो (JMM) नेतृत्व ने घोषणा की है कि यदि केंद्र सरकार ने इस विधेयक को वापस नहीं लिया, तो राज्य के प्रत्येक जिले, प्रखंड और पंचायत स्तर पर व्यापक विरोध प्रदर्शन किए जाएंगे। मुख्यमंत्री सोरेन ने पार्टी सांसदों, विधायकों और प्रमुख नेताओं के साथ आपात बैठक कर आंदोलन की रणनीति तय की है।
सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद नया कानूनी विवाद
उल्लेखनीय है कि जुलाई 2024 में सुप्रीम कोर्ट की 9-न्यायाधीशों की पीठ ने स्पष्ट किया था कि राज्यों को खनिज युक्त भूमि और खनन अधिकारों पर टैक्स लगाने का संवैधानिक अधिकार है। विपक्षी दलों और राज्य सरकारों का आरोप है कि संसद में कानून संशोधित कर सुप्रीम कोर्ट के उसी फैसले के प्रभाव को निष्प्रभावी करने का प्रयास किया गया है, जिससे सहकारी संघवाद (Cooperative Federalism) को गहरा झटका लगा है।
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